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Saturday, July 5, 2014

Qaul-e ahem





هم تو قایل تهی محبت کی تحت قوله  اهم    
هم سی دستور زمانی کا  نیبهایا ن گیا 
فربو جال که تکناکیان فراهم تهن 
ایسا گستاخ چالان هم سی دیخایا ن گیا .

हम तो क़ायल थे मोहब्बत के तहत क़ौले अहम 
हम से दस्तूर ज़माने का निभाया न गया 
फरेबों जाल की तकनीकियां फराहम थीं 
ऐसा ग़ुस्ताख़ चलन हम से दिखाया न गया। 

لوگ ایسه حین ک پابنده وفا حین هی نهن 
ونکا ایمان های قرض ونکا مذهب های قرض
وه حین وه شی کی انهن اور نهان بهتا کوچه 
انکه هر بات قرض ونکا عنوان قرض . 

लोग ऐसे हैं कि पाबंदे वफ़ा हैं ही नहीं 
उनका ईमां है ग़रज़ उनका मज़हब है ग़रज़ 
वोह हैं वह शै कि जिन्हें और न कुछ रास आये  
उनका मक़सद है ग़रज़ उनका उन्वान ग़रज़। 

میلی نجات جهان یس شبه قرض سه کهن 
ای و مره ازاز چلو اور کهن چلتی حین 
جهان ایمانو ودهرم اور وفا کا هو پرچم 
ایسه وعده مین بهت  دور کهن چلتی حین .

मिले नजात जहां इस शबे ग़रज़ से कहीं 
ऐ वो मेरे अज़ीज़ चलो और कहीं चलते हैं 
जहाँ ईमानो धरम और वफ़ा का हो परचम 
ऐसी वादी में बहुत दूर कहीं चलते हैं। 

Monday, May 13, 2013

'Chandodyan' + 'Adharon-ke-sanvad'.

प्रिय जगदीश,
तुम्हारी दोनों कृतियों 'छ्न्दोद्यान्न ' एवं ' अधरों का संवाद ' का अवलोकन किया , बहुत  ही रोचक लगीं . एक रचनाकार के रूप में तुम अपने आप को सुदृढ़ रूप में स्थापित करनें में सफल रहे इस बात की हार्दिक प्रशन्नता है और इस बात की कामना है कि तुम इस दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति के और भी श्रेष्ठ एवं  नवीन कीर्तिमान प्रतिस्थापित कर सको . मुझे सदैव एक जिग्ग्यासु के रूप में इसकी प्रतीक्छा रहेगी . स्नेह एवं अनेकानेक मंगल कामनाओं के साथ , 
यम ० आर ० अवस्थी 

Saturday, April 27, 2013

गुनाह एक नहीं और चार कर लूँगा 
हज़ार बार हजारों ज़वाल  सह लूँगा 
पोंछ पावूँ जो किसी ग़मज़दा के आंसूं मैं 
अपने दामन की सफेदी सियाह कर लूँगा .

Saturday, April 7, 2012

He was much unique a personalty:

अवाक् रह गया जब बिशम्भर ने यह सूचना दी कि चफरिया (ओरीपुरवा) में कल रात श्रीकांत भैय्या नहीं रहे. वे हमारे बड़े मामा के बड़े सुपुत्र थे और लम्बे समय तक बहराइच में इलाज कराकर घर वापस लौटे थे. दुखद सूचना ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया और उनका करीब आठ दशक का ज्वलंत जीवन एक छाया वृत्त की तरह मेरी आँखों के सामने छा गया. यह सच्चाई कि हर किसी का जीवन नश्वर है और अन्ततः हर किसी की यही निश्चित गति है मात्र सांत्वना देने का एक उपकरण है क्योंकि इसका कोइ ब्योहारिक स्वरुप नहीं होता. अनश्वर कोइ नहीं है और मैं भी किन्तु मात्र अपनी सांत्वना के लिए मैं दिवंगत आत्मा के दीर्घकालीन क्र्तत्व एवं उसके आत्मीयता जन्य स्वरुप  को झुठलाने अथवा भुलाने के पक्ष में नहीं हूँ, वरनु उनसे जुड़ी हुई स्मृतियों को आत्म्सातु करना आवश्यक समझता हूँ भले ही वोह कष्टकारक ही क्यों न हों. जिनका जीवन शेष है वोह ऐसा कर सकते हैं. शास्वत सत्य तो यही है कि -

आये दिन जाता हूँ मैखाने की वोर 
कोई दिन होगा कि जब वापस न होंगे 
धरी रह जायेगी सपनों की गठरी 
सुपुर्दे खाक होंगे कि जल कर राख होंगे 

जीवन अपने आप में एक चुनौती है और इसे हमें स्वीकार करना ही होगा और इस चुनौती को हमें एक ध्रुव सत्य के रूप में जीवन पर्यन्त जीना होगा. क्यों न इस कार्य को हम एक अत्याज्य यथार्थ मानकर साहस पूर्वक करें. जो हमारे बीच नहीं रहे उनका जीवन हम जियेंगे और हमारे बाद हमारा जीवन वंशानुगत रूप में हमारी अगली पीढ़ियाँ जियेंगी. सृष्टी का यह विधान हमें एक अत्यंत सहज रूप में स्वीकार होना चाहिए.         

Saturday, February 18, 2012

रुख्ह जो पलटूं तो सारी बात ख़तम .....

रुख्ह जो पलटूं तो सारी बात ख़तम
आँखें उतना नहीं दुखेंगी तब
सवाल एह है कि उस चित्र से मुदुं कैसे
दिले दीवार में मढ़ा है जो

Friday, February 17, 2012

भला मैं बात अपनी क्या करूंगा ...

भला मैं बात अपनी क्या करूंगा
मुझे फुर्सत कहाँ है आंसुओं से
घनी बरसात में जो तर बतर हो
पूछना मेरी कहानी उस सुमन से

Friday, July 27, 2007

एक प्रयास ।

एक प्रयास इस दिशा में कि हिन्दी में कुछ अलग से लिखा जा सके बिना किसी ब्योधान के बिना किसी बाधा के । देखना है कि अभिव्यक्ति का यह स्वरूप कितना सहायक सिद्ध हो सकता है ।